रूस-यूक्रेन युद्ध: बदलते समीकरणों की पड़ताल


CIA Director की Moscow यात्रा के बाद रूस के खिलाफ propaganda में अचानक तेजी क्यों दिखाई दे रही है?

सवाल सिर्फ यह नहीं है कि propaganda क्यों बढ़ा है, सवाल यह है कि इसका strategic उद्देश्य क्या हो सकता है?

पूरे घटनाक्रम को एक साथ देखिए।

अगस्त 2024 में Ukraine ने Kursk में incursion किया। इसे मुख्यतः एक Ukrainian military operation के रूप में पेश किया गया। लेकिन इतने बड़े cross-border operation के लिए satellite imagery, real-time battlefield intelligence, troop movements की जानकारी, electronic और communications intelligence तथा operational coordination बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इन क्षेत्रों में NATO देशों की intelligence और technical assistance की भूमिका होने के संकेत और आरोप लगातार सामने आते रहे हैं।

Cold War के बाद यह escalation का एक अलग स्तर था। मामला केवल weapons और training तक सीमित नहीं रहा; Western intelligence और technology का इस्तेमाल Russian territory के भीतर operations को सक्षम करने तक पहुँच गया।

फिर Kursk operation के दौरान civilians की मौतों की खबरें आईं।

इसके बाद Russia के strategic bomber bases पर drone attacks हुए यानी उन assets को निशाना बनाया गया जो उसकी nuclear deterrence architecture का हिस्सा हैं।

एक के बाद एक threshold पार होती गई।

यहीं से असली खतरा शुरू होता है।

Moscow nuclear confrontation नहीं चाहता, लेकिन, साथ ही वह NATO के विस्तार और Ukraine की Western military integration को अपनी national security के लिए गंभीर threat मानता है। इसका अर्थ यह नहीं कि Russia की हर कार्रवाई उचित है; लेकिन escalation को समझने के लिए उसकी perceived security calculations को समझना जरूरी है।

दूसरी ओर NATO के सामने भी एक strategic reality है।

Cold War के बाद alliance का मूल उद्देश्य कमजोर पड़ गया था। Russia के साथ confrontation ने उसे फिर से एक स्पष्ट adversary, renewed strategic purpose और बड़े defence budgets का आधार दिया है।

इसीलिए Western discourse में एक दिलचस्प contradiction दिखाई देता है:

Russia battlefield में इतना कमजोर है कि Ukraine को हरा नहीं सकता, लेकिन, इतना शक्तिशाली है कि पूरे Europe के लिए existential threat है।

अगर रूस वास्तव में इतना कमजोर है, तो उससे इतना बड़ा खतरा कैसे पैदा हो रहा है?

और अगर वह वास्तव में इतना शक्तिशाली है, तो लगातार उसकी red lines को test करना कितना सुरक्षित है?

यही contradiction चिंता पैदा करता है।

किसी adversary को simultaneously weak enough to challenge और dangerous enough to justify mobilisation दिखाना strategic politics में बेहद उपयोगी narrative हो सकता है।

लेकिन सबसे खतरनाक हिस्सा इसके बाद आता है।

अगर लगातार ऐसी कार्रवाइयाँ होती रहें जिन्हें Moscow अपनी core security interests पर हमला मानता है, तो किसी बिंदु पर Russia की प्रतिक्रिया काफी कठोर हो सकती है।

और तब एक familiar cycle शुरू हो सकती है:

Provocation → Russian retaliation → Russian escalation का narrative → अधिक military spending → और अधिक escalation.

युद्ध की शुरुआत हमेशा किसी एक बड़े निर्णय से नहीं होती। कई बार वह छोटे-छोटे thresholds पार करने की श्रृंखला से बनती है, जहाँ हर अगला कदम पिछले कदम का जवाब बन जाता है।

इसके साथ Western economies की अपनी structural problems भी हैं जैसे high debt, ageing infrastructure, industrial decline और political fragmentation। बड़े पैमाने का military mobilisation defence industries, manufacturing और strategic investment को बढ़ावा दे सकता है।

इसका अर्थ है कि पश्चिम जानबूझकर युद्ध करवाने की कोशिश में है।

और जब escalation के geopolitical और economic incentives मौजूद हों, तब गलत calculation का खतरा वास्तविक हो जाता है।

और nuclear power के साथ सबसे खतरनाक gamble यही है:

उसे लगातार उसकी perceived red lines तक धकेलना, फिर उसके जवाब को “aggression” और “escalation” के प्रमाण के रूप में इस्तेमाल करना।

क्योंकि जिस बिंदु पर दोनों पक्ष यह मानने लगें कि पीछे हटना कमजोरी है, वहीं से crisis control से बाहर जा सकता है।

यही वर्तमान trajectory का सबसे डरावना हिस्सा है।

पश्चिम रूस को यूक्रेन युद्ध से आगे ले जाकर अब NATO और रूस का युद्ध शुरू करवाना चाह रहा है।

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